अमरनाथ यात्रा के दौरान इस वर्ष बाबा बर्फानी का प्राकृतिक हिम शिवलिंग शुरुआती दिनों में ही काफी हद तक पिघल जाने से श्रद्धालुओं के बीच चर्चा तेज हो गई है। जहां इसे आस्था से जोड़कर देखा जा रहा है, वहीं वैज्ञानिक इसे बदलते मौसम और पर्यावरणीय परिस्थितियों का असर मान रहे हैं।
अमरनाथ गुफा में बनने वाला शिवलिंग पूरी तरह प्राकृतिक प्रक्रिया से तैयार होता है। गुफा की छत से रिसने वाली पानी की बूंदें अत्यधिक ठंड में जमकर बर्फ के स्तंभ का रूप लेती हैं। यदि तापमान सामान्य से अधिक हो या सर्दियों में पर्याप्त बर्फबारी न हो, तो यह बर्फीली संरचना अधिक समय तक सुरक्षित नहीं रह पाती।
विशेषज्ञों का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में जम्मू-कश्मीर और पूरे हिमालयी क्षेत्र के मौसम में बड़े बदलाव दर्ज किए गए हैं। सर्दियों में बर्फबारी कम होने और गर्मियों में तापमान बढ़ने से प्राकृतिक बर्फ तेजी से पिघल रही है। यही कारण है कि इस बार शिवलिंग यात्रा के शुरुआती चरण में ही काफी छोटा हो गया।
जानकारों के अनुसार, अमरनाथ यात्रा के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की आवाजाही, कृत्रिम प्रकाश व्यवस्था और अन्य मानवीय गतिविधियां भी गुफा के आसपास के वातावरण को कुछ हद तक प्रभावित कर सकती हैं। हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि इनकी तुलना में जलवायु परिवर्तन का प्रभाव कहीं अधिक गंभीर है।
पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि हिमालयी क्षेत्रों में लगातार बढ़ता तापमान केवल अमरनाथ शिवलिंग ही नहीं, बल्कि ग्लेशियरों और अन्य प्राकृतिक बर्फ संरचनाओं के लिए भी चुनौती बनता जा रहा है। उनका मानना है कि बदलते मौसम के इस प्रभाव को कम करने के लिए पर्यावरण संरक्षण और ग्लोबल वॉर्मिंग पर नियंत्रण की दिशा में ठोस प्रयास जरूरी हैं।
हालांकि, अमरनाथ यात्रा और श्रद्धालुओं के दर्शन सामान्य रूप से जारी हैं। प्रशासन श्रद्धालुओं की सुरक्षा और सुविधाओं के लिए आवश्यक इंतजाम बनाए हुए है।



