नेशनल डेस्क: देश के प्रसिद्ध इंजीनियर और ‘ब्रिज मैन ऑफ इंडिया’ के नाम से मशहूर पद्मश्री सम्मानित गिरीश भारद्वाज का मंगलवार को 76 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। उन्होंने कर्नाटक के दक्षिण कन्नड़ जिले के सुलिया स्थित एक निजी अस्पताल में उम्र संबंधी बीमारी के चलते अंतिम सांस ली। उनके निधन से इंजीनियरिंग और ग्रामीण विकास के क्षेत्र को अपूरणीय क्षति पहुंची है। गिरीश भारद्वाज ने अपने नवाचार और सामाजिक सोच के दम पर देश के दूर-दराज़ इलाकों में रहने वाले हजारों लोगों की जिंदगी आसान बनाई। उन्होंने कर्नाटक, केरल, तेलंगाना और ओडिशा समेत कई राज्यों में 140 से अधिक कम लागत वाले झूला पुलों का निर्माण कराया। इन पुलों ने उन गांवों को मुख्य मार्गों से जोड़ा, जो बरसात के मौसम में नदियों और नालों के कारण पूरी तरह कट जाते थे।
उनकी इस अनूठी पहल की शुरुआत वर्ष 1989 में हुई। उस समय सुलिया के अरामबुर गांव के लोगों ने पयस्विनी नदी पर पुल बनाने की मांग की थी। झूला पुल बनाने का अनुभव न होने के बावजूद उन्होंने खुद तकनीकी जानकारी जुटाई, विशेषज्ञों से सलाह ली और ग्रामीणों के सहयोग से दो लाख रुपये से भी कम लागत में पुल तैयार कर दिया। यह पुल सफल रहा और यहीं से उनके जीवन का नया अध्याय शुरू हुआ। इस उपलब्धि के बाद कर्नाटक सरकार ने उन्हें अन्य ग्रामीण क्षेत्रों में भी इसी तरह के पुल बनाने की जिम्मेदारी सौंपी। धीरे-धीरे उनका मॉडल देशभर में पहचान बनाने लगा। उन्होंने यह साबित किया कि सीमित संसाधनों के बावजूद मजबूत, सुरक्षित और टिकाऊ बुनियादी ढांचा तैयार किया जा सकता है। उनके बनाए पुलों ने बच्चों के लिए स्कूल, मरीजों के लिए अस्पताल और किसानों के लिए बाजार तक पहुंच आसान बनाई।
पेशे से मैकेनिकल इंजीनियर गिरीश भारद्वाज केवल तकनीकी विशेषज्ञ ही नहीं, बल्कि समाजसेवा के प्रति भी पूरी तरह समर्पित थे। कई सामुदायिक परियोजनाओं में उन्होंने अपनी पेशेवर फीस नहीं ली और जरूरत पड़ने पर निजी स्तर पर आर्थिक सहयोग भी किया, ताकि निर्माण कार्य बिना किसी रुकावट के पूरा हो सके। ग्रामीण क्षेत्रों में किफायती और टिकाऊ इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करने में उनके उल्लेखनीय योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने 2017 में उन्हें पद्मश्री सम्मान से सम्मानित किया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी उनकी ‘सेतु बंधु’ पहल की सराहना करते हुए इसे समाज सेवा में इंजीनियरिंग का उत्कृष्ट उदाहरण बताया था।
गिरीश भारद्वाज सुलिया में रैशनल इंजीनियरिंग वर्क्स का संचालन भी करते थे और युवा इंजीनियरों को कम लागत वाली तकनीकों के विकास के लिए प्रेरित करते थे। उनके परिवार में दो बेटे और एक बेटी हैं। उनके बेटे पतंजलि भारद्वाज अब उनके इस मिशन को आगे बढ़ा रहे हैं। उनके निधन पर देशभर के नेताओं, इंजीनियरों और सामाजिक संगठनों ने गहरा शोक व्यक्त किया है। गिरीश भारद्वाज ने केवल पुल ही नहीं बनाए, बल्कि विकास और अवसरों से वंचित हजारों लोगों की जिंदगी को भी नई दिशा दी। उनके बनाए पुल आने वाले वर्षों तक उनकी दूरदर्शी सोच, सामाजिक समर्पण और नवाचार की मिसाल बने रहेंगे।



