पंजाब में नशे के खिलाफ जारी लड़ाई में अब किताबें भी अहम भूमिका निभा रही हैं। मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान के ‘युद्ध नशियां विरुद्ध’ अभियान के तहत सरकारी नशा मुक्ति एवं पुनर्वास केंद्रों में स्थापित पुस्तकालय नशे से उबर रहे युवाओं के लिए नई उम्मीद बनकर उभरे हैं। ये पुस्तकालय मरीजों को नशे की लत से बाहर निकलने, मानसिक स्वास्थ्य बेहतर बनाने और सकारात्मक जीवनशैली अपनाने में मदद कर रहे हैं।
पंजाब के ‘लीडरशिप इन मेंटल हेल्थ प्रोग्राम’ के तहत शुरू की गई इस पहल में युवाओं को भी जोड़ा गया है। फेलोज़ द्वारा अब तक राज्य के 10 जिलों में स्थित सरकारी नशा मुक्ति केंद्रों में पुस्तकालयों की स्थापना और उनके विस्तार में सहयोग दिया गया है। सरकार का लक्ष्य वर्ष के अंत तक 80 प्रतिशत से अधिक नशा मुक्ति एवं पुनर्वास केंद्रों तक इस सुविधा को पहुंचाना है।
इन पुस्तकालयों में धार्मिक ग्रंथों, सिख इतिहास, साहित्य, कविता, आत्मकथाओं, पंजाबी संस्कृति और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी पुस्तकों का संग्रह उपलब्ध कराया गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि पढ़ने की आदत मरीजों में एकाग्रता, आत्मचिंतन और सकारात्मक सोच को बढ़ावा देती है, जिससे उनकी रिकवरी प्रक्रिया को मजबूती मिलती है।
बठिंडा स्थित सरकारी नशा मुक्ति एवं पुनर्वास केंद्र में पुस्तकें अब उपचार का अहम हिस्सा बन चुकी हैं। यहां के काउंसलर सोमा के अनुसार, पहले केंद्र में पुस्तकालय नहीं था, लेकिन डॉक्टरों की पहल से इसकी शुरुआत हुई। अब मरीज अपना खाली समय किताबें पढ़ने और एक-दूसरे के साथ प्रेरणादायक कहानियों पर चर्चा करने में बिताते हैं। उन्होंने बताया कि कहानियां, कविता और आत्मकथाएं मरीजों के बीच सबसे अधिक लोकप्रिय हैं और इससे नशे की तलब को नियंत्रित करने में मदद मिल रही है।
सोमा के मुताबिक, पढ़ने की आदत मरीजों को जीवन और भविष्य को नए नजरिए से देखने के लिए प्रेरित करती है। इससे उनमें सकारात्मकता बढ़ती है और वे रिकवरी से जुड़ी गतिविधियों में अधिक सक्रियता से हिस्सा लेने लगते हैं।
इसी तरह होशियारपुर स्थित नशा मुक्ति केंद्र की क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट संदीप कुमारी ने बताया कि उन्होंने वर्षों में कई मरीजों के जीवन में किताबों के जरिए सकारात्मक बदलाव देखा है। उन्होंने कहा कि वर्ष 2016 में घरों से किताबें इकट्ठा कर पुस्तकालय की शुरुआत की गई थी। समय के साथ मरीज प्रेरणादायक साहित्य, धार्मिक पुस्तकों और महान हस्तियों की जीवनियों की ओर आकर्षित होने लगे। उन्होंने बताया कि डॉ. नरेंद्र सिंह कपूर की पुस्तक ‘डूंघियां सिखरां’ मरीजों के बीच सबसे अधिक पसंद की जाती है।
काउंसलरों के अनुसार, संघर्ष और कठिनाइयों के बाद सफलता हासिल करने वाले लोगों की कहानियां मरीजों को विशेष रूप से प्रेरित करती हैं। बठिंडा केंद्र में उपचाराधीन नथाना गांव के परमिंदर सिंह (बदला हुआ नाम) ने बताया कि सिख इतिहास और आत्मकथाओं को पढ़ने से उन्हें जीवन में आगे बढ़ने का हौसला मिलता है। वहीं मलेरकोटला के अब्बासपुरा निवासी बलदेव सिंह ने कहा कि किताबों ने उन्हें फिर से पढ़ने की अपनी पुरानी आदत से जोड़ दिया है और इससे उनका ध्यान अपने लक्ष्य पर केंद्रित रहने में मदद मिल रही है।
विशेषज्ञों का कहना है कि शुरुआत में पढ़ने में रुचि न दिखाने वाले मरीज भी धीरे-धीरे इस आदत को अपना लेते हैं। वे छोटी पुस्तकों से शुरुआत करते हैं और बाद में धर्म, इतिहास, कविता और अन्य विषयों पर घंटों चर्चा करते हैं।
एक साधारण से पन्ने को पलटने के साथ कई लोग अपनी जिंदगी का नया अध्याय भी शुरू कर रहे हैं। मुख्यमंत्री भगवंत मान के ‘युद्ध नशियां विरुद्ध’ अभियान के तहत पुस्तकालय अब नशा मुक्ति की इस लड़ाई में उम्मीद और बदलाव का मजबूत माध्यम बनकर सामने आए हैं।



